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श्री रंकण भवन रांकावत समाज संस्था, रानी स्टे.

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वैष्णव कौन ?

हमारे अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य का निर्माण

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लेखक: वासुदेव पुत्र श्री राधेश्याम शर्मा तखतगढ़

वैष्णव वनना कठिन कार्य है

यह बात जो वन्यु सुनेगा, उसका चित्त आश्चर्य से भर उठेगा। क्योंकि जिसने वैष्णव कुल में जन्म लिया वही अपने को वैष्णव समझने लगता है, लेकिन यह इतना सरल नहीं। आत्मा के बिना शरीर जिस प्रकार एक मांस, मज्जा आदि का महत्वहीन लोथड़ा मात्र है उसी प्रकार वैष्णव के गुणों को जीवन में उतारे बिना व्यक्ति सही माने में वैष्णव नहीं बन सकता।

यह प्रश्न उठता है कि आखिर कौन सी ऐसी योग्यता, डिग्री या गुण है जिनसे व्यक्ति वैष्णव बनने का अधिकारी होता है। भक्तों में श्रेष्ठ नरसिंह मेहता इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार बताते हैं –

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जै पीर पराई जाने रे ।
पर दुखे उपकार करे, तो ए मन अभिमान न आणे रे ।।

सकल लोक मा सहुने वंदे, निदा न करे केनी रे ।
बाच काछ मन निश्चल राखे, धन जननी तैनीं रे ॥।

सम दृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जैने मात रे ।
जिव्हा थकी असत्य न बोले, पर धन न जाले हाथ रे ॥

मोह माया व्यापे नहीं जैने, दृढ वैराग्य जैना मन म रे ।
राम नाम स ताली लागी, सकल तिरथ तेना तन मा रे ।।

वण लोभी ने कपट रहित छे, काम कोध निवार्या ।
भणे नरसयो तैए दरशन करता, कुल एकातर तारिया रे ।।

वैष्णव वह है जो- पराई पीर समझता है।

पराये दुखः में मदद करता है, पर उसका अहंकार नहीं करता।

सब को वंदना करता है, निदा किसी की नहीं करता।

मन से, वचन से और कर्म से स्थिर रहता है।

छोटे-बड़े सब में सम दृष्टि रखता है।

तृष्णा का त्याग कर देता है, पर स्त्री को माता के समान मानता है।

कभी झूठ नहीं बोलता, पराई कौड़ी नहीं छूता।

मोह माया से निलिप्त रहता है।

दृढ़ वैराग्यन होता है, राम नाम हर समय जपता रहता है।

निर्लोभी रहता है, कपट से दूर रहता है, काम और क्रोध को मार भगाता है।