नारी — चरित्र, करुणा और समाज
पति के लिये चरित्र, सन्तान के लिये माता, समाज के लिये शील, विश्व के लिये दया, जीवन मात्र के लिये करुणा संजोने वाली महाप्रकृति नाम ही नारी है। परिस्थिति-विशेष में नर नारी को, नारी नर को किसी भी दृष्टि से क्यों न देखे पर वास्तव में वे एक दूसरे के पूरक हैं — परस्पर सम्बन्ध है और उसका सम्बन्ध स्थायी है।
नारी को कहीं शक्ति, कहीं सहचारिणी, कहीं रमणी, कहीं आराध्या, कहीं माया और कहीं दुर्भेद्य पहेली के रूप में भी देखा गया है। परिणामतः नारी का सम्मान, आरम्भिक काल में भारतीय आदर्श रहा है। आज भी नारी देवी कहलाती है।
नारी का समाज में क्या महत्व है? नारी समाज से क्या पाती है?
दया देती है समाज को, वीर व महान पुत्र देती है — फिर भी नारी (माँ) को समाज में क्या आदर, सम्मान मिलता है? एक नारी जिसे (अबला) कहा गया — समाज में उसे कौन से दुख झेलने पड़ते हैं? क्या उसे सुख भी मिलता है?
जिस नारी ने नर को जन्म दिया, उसे पालकर चलना बताया, बोलना सिखाया — उसी नर ने क्या नारी को धोखा दिया? उसी के दिल को चोट पहुँचाई। क्या यह सब उचित है? अगर नहीं, तो समाज में नारी को इतना कमजोर क्यों समझा गया है?
प्रश्न
क्या नारी अपना दुख किसी से साझा नहीं कर सकती?
सोचने का विषय
समाज को नारी के योगदान का वास्तविक मान देना चाहिए।