ब्रह्मचर्य की स्थिति
एक और कोने में बैठा ब्रह्मचर्य अपने भाग्य को कोस रहा है तथा अपने भविष्य से चिंतित है। आओ, उससे पूछें वह क्या करना चाहता है।
“मेरा नाम ब्रह्मचर्य है। मेरा पालन कई प्रकार से होता आ रहा है लेकिन अब मेरी स्थिति दिनों-दिन गिरती जा रही है। मैं इतना सुदृढ़ नहीं हूं जितना कुछ वर्षों पूर्व था। मेरा पाठ वैदिक काल में ऋषि-मुनि करवाया करते थे, जिसमें मैं सुखपूर्वक रहता था। मेरे नाम का एक आश्रम हुआ करता था जिसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते थे।
मेरे दुश्मन इस २५ वर्षों के काल में तनिक भी अपना असर मुझ पर नहीं डाल सकते थे। मेरे कारण ही देवताओं ने मृत्यु तक को भी जीत लिया था। जिस देश में बालक के लिए मेरा पालन करना अनिवार्य था, जिस जाति की उन्नति के चार आश्रमों में मेरा आश्रम सबसे पहला आश्रम था, बड़े ही खेद का विषय है कि उसी देश में आज मेरा अभाव हो गया है।
जिस देश के शिशुओं के पदाघात से पहाड़ की चट्टानें चकनाचूर हो जाती थीं, वही तेजस्वी देश आज दिशाहीन हो गया है। आज के अधिकतर बालकों में बचपन में ही मेरे नियमों को तोड़ देने से बचपन सीधा बुढ़ापे में बदल जाता है। कलियाँ खिलने से पूर्व ही मुरझा जाती हैं।
आजकल के स्कूल-कॉलेजों की बड़ी ही बुरी दशा है और मैं उनमें पिसता जा रहा हूं। सौभाग्यवश शायद ही कोई ऐसा स्कूल या कॉलेज होगा जहाँ बालक मेरा पालन करते हों। बड़े ही दुख के साथ मुझे कहना पड़ता है कि भारत के भावी आशास्थल, भारत-जननी के प्रिय बालकों की जीवनशक्ति शिक्षा के नाम पर बुरी तरह से नष्ट हो रही है।
आज के अधिकतर बालक बुक स्टॉलों पर अश्लील पुस्तकों पर ही नजर दौड़ाते मैंने देखा है। मात्र इसी कारण से नौसिखिए हकीम अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ की आधी उपाधि लगाकर तथा ‘गुप्त रोग विशेषज्ञ’ बताकर सरेआम लूट रहे हैं। यह सब, प्रथम तो पाश्चात्य शिक्षा का विषैला रोग है जो बालक को अपने धर्म से गिरा देता है; दूसरा, आजकल के स्कूल-कॉलेजों का विषय-प्रधान बिगड़ा हुआ वातावरण उसके जीवन की प्रायः समस्त शक्ति बिगाड़ देता है।
इसके अतिरिक्त बाल विवाह का भी मेरी तबाही में काफी हद तक हाथ है। यदि इस मूल को रोका नहीं गया तथा मेरे नियमों का पालन नहीं किया गया तो बड़ा ही अनर्थ हो जाने की आशंका है। वह अनर्थ स्थायी है।